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वेद

वेद – सनातन धर्म की आधारशिला

वेद सनातन धर्म के सबसे प्राचीन, दिव्य और पवित्र ग्रंथ हैं। इन्हें ईश्वरप्रदत्त ज्ञान माना गया है, जिसे ऋषियों ने तपस्या और साधना के माध्यम से अनुभव कर मानवता को प्रदान किया। वेदों में जीवन के उद्देश्य, प्रकृति के नियम, धर्म, कर्म, यज्ञ और ब्रह्मांडीय चेतना का गूढ़ एवं शाश्वत ज्ञान निहित है।

वेदों के चार स्वरूप

ऋग्वेद मनुष्य को प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलन का संदेश देता है।

ऋग्वेद – देवताओं की स्तुति और ब्रह्मांडीय ज्ञान

ऋग्वेद चारों वेदों में सर्वाधिक प्राचीन वेद है। इसमें देवताओं की स्तुति हेतु रचित दिव्य मंत्रों और सूक्तों का विशाल संग्रह है। ऋग्वेद मानव और ब्रह्मांड के संबंध को उजागर करता है तथा प्रकृति की शक्तियों में निहित चेतना का बोध कराता है।

सामवेद

सामवेद – भक्ति, संगीत और साधना का वेद

सामवेद मनुष्य को भक्ति के माध्यम से आत्मिक आनंद और आंतरिक शांति की अनुभूति कराता है। इसे संगीत का वेद कहा जाता है, क्योंकि इसमें मंत्रों को स्वर, लय और गायन के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। सामवेद के अधिकांश मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं, किंतु उनका स्वरूप पूर्णतः संगीतमय और साधनात्मक है।

यजुर्वेद
यजुर्वेद

यजुर्वेद – कर्म, यज्ञ और धार्मिक विधियों का वेद

ऋग्वेद चारों वेदों में सर्वाधिक प्राचीन वेद है। इसमें देवताओं की स्तुति हेतु रचित दिव्य मंत्रों और सूक्तों का विशाल संग्रह है। ऋग्वेद मानव और ब्रह्मांड के संबंध को उजागर करता है तथा प्रकृति की शक्तियों में निहित चेतना का बोध कराता है।

अथर्ववेद

अथर्ववेद – जीवन और समाज का वेद

अथर्ववेद मानव जीवन की व्यावहारिक और दैनिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है। यह वेद सामान्य जन-जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसमें परिवार, समाज, स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानसिक शांति से संबंधित मंत्रों का समावेश है

अथर्ववेद