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महाभारत – धर्म, कर्म और जीवन का शाश्वत दर्शन

महाभारत क्या है?

महाभारत सनातन धर्म का एक अत्यंत विराट और गूढ़ महाकाव्य है, जिसकी रचना महर्षि वेदव्यास जी ने की। यह केवल कुरुक्षेत्र के युद्ध की गाथा नहीं, बल्कि मानव जीवन के प्रत्येक पहलू का दर्पण है। इसमें धर्म–अधर्म के संघर्ष के माध्यम से कर्तव्य, नीति, राजनीति, पारिवारिक संबंध, समाज और आत्मबोध का गहन विवेचन किया गया है। महाभारत मनुष्य को उसके निर्णयों और उनके परिणामों का बोध कराता है।

महाभारत का महत्व

महाभारत हमें यह सिखाता है कि धर्म का मार्ग सरल नहीं होता, किंतु अंततः वही सत्य, न्याय और विजय की ओर ले जाता है। यह ग्रंथ राजा, योद्धा, गुरु और सामान्य मनुष्य—सभी को उनके दायित्वों और कर्मों की याद दिलाता है। महाभारत आज भी जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने की प्रेरणा देता है और मानवता को धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश देता है।

महाभारत

महाभारत की संरचना

महाभारत कुल 18 पर्वों में विभाजित है और इसमें लगभग 1,00,000 श्लोक हैं। महाभारत का हृदय भगवद गीता है, जो श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद के रूप में प्रस्तुत है।

महाभारत के प्रमुख पात्र

श्रीकृष्ण

धर्म, नीति और दिव्य मार्गदर्शक

अर्जुन

कर्तव्य और आत्मसंघर्ष का प्रतीक

भीष्म पितामह

प्रतिज्ञा और त्याग

द्रोणाचार्य

गुरु धर्म

कर्ण

दानवीरता और संघर्ष

युधिष्ठिर

सत्य और धर्म

दुर्योधन

अहंकार और अधर्म

महाभारत

महाभारत और जीवन-दर्शन

महाभारत यह दर्शाता है कि जीवन केवल श्वेत और श्याम का सरल विभाजन नहीं है, बल्कि जटिल परिस्थितियों, संघर्षों और नैतिक दुविधाओं से भरा हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों के आधार पर निर्णय लेने होते हैं, जिनका प्रभाव वर्तमान और भविष्य दोनों पर पड़ता है।

महाभारत की आधुनिक प्रासंगिकता

आधुनिक युग में भी महाभारत उतना ही प्रासंगिक है। यह राजनीति, नेतृत्व, पारिवारिक संबंधों और नैतिक मूल्यों में संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है। महाभारत हमें सिखाता है कि सत्ता, सफलता और अधिकार से पहले संयम, करुणा और धर्म का पालन अनिवार्य है।

महाभारत

महाभारत के प्रमुख उपदेश

महाभारत हमें जीवन के शाश्वत सत्य सिखाता है— कर्म का फल अवश्य मिलता है | अधर्म का अंत निश्चित होता है |अहंकार विनाश का कारण बनता है |सत्य और नीति सदैव सर्वोपरि हैं

धर्मो रक्षति रक्षितः🚩